Tuesday, February 2, 2016

मंत्र जप (हवन-तर्पण-मार्जन-कन्यापूजन/ब्राह्मण भोज ) - Mantra Jap (Hawan-Tarpan-Marjan-Kanya Pujan/ Brahman Bhoj)

मंत्र पुश्चरण :- किसी भी मंत्र के जप के लिए जो कुछ महत्वपूर्ण अंग होते हैं उनका विवरण निम्न प्रकार है





जप :- इस क्रिया में किसी मन्त्र के निर्धारित जप करने होते हैं, जिस प्रकार और जितनी मात्रा में आपके गुरु द्वारा निर्देश दिए गए हों।


विशेष :- यदि जिस व्यक्ति/गुरु ने आपको मन्त्र जप की सलाह या अनुदेश दिए हैं और वे इस बात के बारे में आश्वस्त नहीं हैं कि अमुक मंत्र की जप संख्या कितनी होगी ऐसी दशा में उस मन्त्र का जप बिलकुल भी ना करें काम्य जप या अनुष्ठान में यह एक बाध्यकारी निर्देश है।


किन्तु यदि कोई मंत्र जीवन-मरण का प्रश्न लिए हुए हो अथवा स्वइष्ट से सम्बंधित हो तब गुरु अथवा इष्ट से आज्ञा प्राप्त कर जप कर्म किया जा सकता है - मंत्र विज्ञान के अनुसार एकवर्णीय बीज मंत्रों का जप सवा लाख होना चाहिए - जिसमे तीन का गुणक किया जाना चाहिए। यदि कोई बीज आजीवन जप के लिए हो तब तीन से गुणा करने की आवश्यकता नहीं होगी। किन्तु जप अनुष्ठान अवश्य ही करना चाहिए।


हवन :- हवन कृत्य प्रायः गुरु के निर्देशानुसार करना चाहिए किन्तु यदि गुरु उपलब्ध ना हों तब उस दशा में जप कर्म का दसवां हिस्सा हवन करना चाहिए।


यथा यदि 125000 जप कर्म हुए हैं तो 12500 हवन आवृत्तियाँ होंगीं।


हवन कर्म में दायें हाथ से आहुति दी जाती है एवं बाएं हाथ से माला का संचालन होता है - एक बार मन्त्र का उच्चारण करते हुए आहुति डालनी होती है।


यथा : यदि "क्रीं" मन्त्र जप का हवन करना हो तो "क्रीं स्वाहा" कहकर आहुति देनी होगी।


बहुधा मंत्रों में प्रणव "ॐ" भी लगा होता है और बहुत बार नहीं - ऐसी दशा में भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बीज मन्त्र स्वयं में पूर्ण और सबल होते हैं अस्तु अन्य प्रणवादि लगाने की मूल रूप से आवश्यकता नहीं होती किन्तु लगा देने पर कोई हानि भी नहीं होती।


तर्पण :- हवन कर्म के उपरांत "तर्पण"कर्म का विधान होता है जिसमे कोई ऐसा पात्र लेने की आवश्यकता होती है जिसमे चार या पांच लीटर पानी आ सके - जैसे कि कोई भगोना-परात या फिर बड़ी थाली आदि।


उस पात्र में जल भरकर थोड़ा गंगाजल मिला लें और तत्पश्चात थोड़ा शहद-घी-गुड-केशर-गौदुग्ध -पुष्पादि मिलाकर दाहिने हाथ की अंजलि में जल भरकर पुनः उसी पात्र में छोड़ दें और बाएं हाथ से माला जप का प्रयोग करें।


यथा :- "क्रीं तर्पयामि" का उच्चारण करते हुए जल को दायें हाथ की अंजुली में भरकर पुनः उसी पात्र में गिरा दें और बाएं हाथ से माला पर मन्त्र जपते और दायें हाथ से जल भरते-गिराते रहें।


तर्पण क्रिया हवन की संख्या का दसवां हिस्सा होती है अर्थात यदि 125000 जप कर्म तो 12500 हवन कर्म एवं 1250 तर्पण कर्म होंगे।


मार्जन :- मार्जन की क्रिया में एक पात्र में गंगाजल अथवा सुवासित जल जिसमे पुष्प एवं सुगन्धादि का मिश्रण हो, एक हाथ में कुश घास लेकर उसे उस जल में डुबोकर बाएं हाथ में माला लेकर मंत्र बोलते हुए "क्रीं मार्जयामि" कुश से जल यंत्र अथवा इष्ट के चित्र पर जल छिड़कें तत्पश्चात पुनः मंत्र उच्चार करते हुए पुनः जल छिड़कें - यह क्रिया तर्पण कर्म के दसवें हिस्से जितना होगा अर्थात 125 बार मार्जन होगा।


कुश घास उपलब्ध ना होने की दशा में इष्ट के लिए विहित प्रिय पुष्प अर्थात फूल का प्रयोग किया जा सकता है।


तत्पश्चात ११ अथवा २१ कन्या/ब्राह्मणगरीबों को जो भी उपलब्ध हों अथवा तीनों को सामर्थ्यानुसार भोजन एवं दक्षिणादि देकर अनुष्ठान संपन्न करें।


ब्राह्मण भोज में ध्यान रहे कि ऐसे ही ब्राह्मण भोज के अधिकारी होंगे जो वेदपाठी एवं चरित्रवान तथा तीनों संध्या करने वाले हों।


यदि आर्थिक स्थिति साथ ना देती हो तो कन्याओं को मिश्री आदि बाँटें।


कुछ आवश्यक एवं सलाह :-

1. जप अथवा अनुष्ठान काल में किसी से बहुत ज्यादा बात-चीत या हंसी-मजाक अथवा क्रोध पूर्ण व्यवहार ना करें।


2. प्रतिदिन जप कर्म के पश्चात कम से कम 40 मिनट या घंटे भर तक मौन रह इष्ट चिंतन करें।


3. कभी किसी की निंदा या बुराई ना करें एवं अहंकार आदि को नियंत्रित रखें।


4. अपने आसन एवं माला आदि को किसी के साथ साझा ना करें इससे आपके पुण्य की क्षति होती है तथा अन्य की आध्यात्मिक हानि भी होती है क्योंकि इन दोनों वस्तुओं में आपके इष्ट की ऊर्जा समाहित होती है जो आपकी प्रकृति के अनुसार उत्पन्न और विकसित हुयी होती है जो विषम या भिन्न प्रकृति के साधक के लिए हानिकारक हो सकती है।


5. प्रयास करें कि यदि जप/अनुष्ठान काल के दौरान कोई समस्या हो तो उसके लिए किसी प्रकार की याचना या घबराहट प्रदर्शित ना करें क्योंकि यह आपकी परीक्षा हो सकती है।


6. किसी को वरदान अथवा अभिशाप देने जैसे कृत्य ना करें - इनसे आपकी अर्जित ऊर्जा का क्षय होता है।

माता महाकाली शरणम् 

1 comment:

Rudraksha Ratna said...

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